Tuesday, October 16, 2007

तीन कविताएं

तीन कविताएं



(१)



मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में
तेरी तस्वीर बंद है .

तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूं
चोरी-चोरी, चूपके-चूपके ।

मेरे होठों पर कई दिनों से
तितली बैठने नहीं आयी ।

मेरी आंखों में कई दिनों से
एक कटी-पतंग उड रही है ।

मेरे कानों में निरव स्वर ने
झंकार देना छोड दिया है ।

मेरी अंगूलियों ने स्पर्श संवेदना
गंवा दी है ।

मैं एक बुत-सा बन गया हूं -

मुझे पारसमणि की तलाश है ।

तुम कब आओगी ?



(२)



तुम कब आओगी ?



रात के अंधेरों ने
मुझे बिस्तर पर तडपते हुए देखा है ।

कभी-कभार खुली आंखें
सपना देख रही होती है ।

बगल में रहे पेड के पत्तों की खडखडाहट
झांका करती है ,
मेरे बिस्तर पर , जो मेरे जिस्म से
भरा पडा होता है ।

चूपके-चूपके याद दस्तक दे जाती है
मेरे उद्विग्न मन के पट पर
और
उस रात मैं ज़िंदा जलाया जाता हूं
- उन यादों के हाथों , जो तेरे जाने के बाद आती है ।

मेरे कानों में तेरे अटहास की आवाज़
गुंज़ने लगती है .
उस दिन मेरा बिस्तर मुझे
मेरी आंखों के नीचे गिला हुआ मिलता है
फिर मैं अपने आपको पुछ बैठता हूं

तुम कब आओगी ?



(३)



तुम आओगी या नहीं ?

अध खुली आंखों मैं इंतज़ार ने
अभी-अभी टपकना शुरू किया है ।


टेबुल पर पडी किताब के पन्ने
छत पर लटके पंखे से उलटते रहते है ।


तुम आओगी या नहीं
यह मुझे नहीं पता
मगर
हररोज़ तुम्हारी याद सपनों में आकर
मुझे जागने को विवश कर देती है ।


कभी उत्तर मिलेगा या नहीं
कि
तुम आओगी या नहीं ?

Monday, September 03, 2007

क्षणिकायें

चार विचार, चार क्षणिकाओँ में


हमसफ़र

नश्वर दुनिया को छोडकर
चले जायें हम
किसी शाश्वत सत्य की शोध में
जो हम दोनों को
बांधे हुए है
पिछले कई जन्मों से...

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किसी नदी के किनारे बैठा था में
तुने आहिस्ते से मेरे बगल में
जगह बना ली।
हम देखते रहे .... उठती, ठहरती, रूकती, दौड़ती लहरों को।
शाम ढले चल दिए हम -
में उत्तर में तुम दक्षिण में।

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एक मोड पर हुई
एक छोटी सी मुलाक़ात के बाद
हम चल दिए साथ - साथ।
एक मोड पर आकर
तुमने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया।

एक मोड पर
तुने कहा -
मुजे अब पूर्व की ओर जाना है।
तुम चल दिए.
मैं अकेला पश्चिम की ओर डूबने लगा।

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समंदर के किनारे
हम चने चबाते - चबाते
देख रहे थे "सन - सेट"।
सूर्य को क्षितिज को चुम्बन देते हुए देख
तुने धर दिया मेरे भाल पर
एक ठन्डा, हल्का सा चुम्बन।

आज भी अपने भाल पर
वही ओठों के "फिन्गर-प्रिन्ट" लिये
ढुँढता हूं तुम्हें
क्षितिज पर डूबते हुए
सूरज के उस पार।

तुम कहां ?

Friday, August 17, 2007

मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये

मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये मैं यहां मेरे मार्गदर्शक मित्र कविवर श्री सुरेन्द्र कडिया जी की कुछ रचनाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ...

इन कविताओं पर आपका प्रतिभाव सादर निमंत्रित है...

श्री सुरेन्द्र कडिया जी से आप kadiya@sbs.co.in पर संपर्क कर सकते हैं ...


ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા

ફૂલોની ફરશ પર પસીનો ઠર્યો છે
કહે છે, હવાઓએ ઓચ્છવ કર્યો છે.

ફરી એની સામે અરીસો ધર્યો છે
ફરી એક તાજો સિતારો ખર્યો છે.

મુબારક હો સઘળું અખંડિત-અખંડિત
અમે શ્વાસનો સહેજ બખિયો ભર્યો છે.

હતો એક બુદ બુદ અહંથી છકેલો
કહે, આખેઆખો સમંદર તર્યો છે.

કદી બંધ કરશો તો અંધારું થાશે
કિતાબોની વચ્ચે સૂરજ તરવર્યો છે.

(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા


અઢળક ઊંડે તળિયે બેઠા
અમે અમારા ફળિયે બેઠા

વત્તો-ઓછો ભેદ મળે તો
જળમાંથી ઝળહળિયે બેઠા

શબદ-શબદની માયા બાંધી
કાગા થઈ કાગળિયે બેઠા

શબરી એંઠાં બોર ધરાવે
અનહદ-ફળના ઠળિયે બેઠા

નવલખ તારા ઠોલી થાક્યા
પછી તમારા નળિયે બેઠા

(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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(कवि श्री सुरेन्द्र कडिया जी की अनुमति से ब्लोग पर प्रकाशित)

Thursday, July 26, 2007

समंदर में

कभी कस्ती, कभी तूफ़ां, कभी लहरें समंदर में;
कई यादें, कई आंसू, कई चहरे समंदर में.

वहां था पानी ही पानी, नहीं शबनम की दो बुंदें;
अरे! आश्चर्य! कोई दे रहा पहरे समंदर में.

मत छेड तू उसको, वह पीछे पीछे दौडेगा;
अरे! ओ डूब जाने के कई खतरे समंदर में.

कितनी सदियों से वह चुपचाप है बैठा;
न जाने कौन है जो है, इतने गहरे समंदर में.

अभी तो सिर्फ़ छुआ था, मुझे वह मेरे बिस्तर पर;
तभी से दौडती है उठती हुई लहरें समंदर में.

Friday, July 06, 2007

डाक पेटी की सिहरन

अंधियारी गली के किनारे खडे
एक लैंप पोस्ट पर टंगी हुई
डाक पेटी में -

हररोज डाला करता हूँ मैं -
एक ख़त।

मेरा ख़त अन्दर जाते ही
डाक पेटी के बदन में सिहरन
उठती है,
न जाने क्यों ?

एक दिन मैंने पूछा -
"तू क्यों सिहर उठती हो
मेरे ख़त डालने पर ?"

बोली -
" उत्तर न मिलने पर भी
ख़त डाले जा रहे हो ! -
सिहर न उठू तो क्या करूं ?
तूने मुझे वन वे जो बना रखा है ।"

बिदाई पर

कभी कभार
एक लम्हा
छूट जाता है हमारे पीछे ही
दीवारों पर लिखा तो
मिटा सकते हैं हम
लेकिन
दीवारों के जिस्म में लिखा
कहॉ पोछ सकते हैं कभी !

Friday, June 22, 2007

याद

कब तक ढोते रहोगे तुम
मेरी यादों को ?
कितने क्षण ?
- लाखों - करोडों क्षण ?
ठीक है, याद ढोना नहीं,
- याद करना नहीं।

परंतु
इतना जरूर करना
भूल मत जाना.

Friday, June 15, 2007

आओ चले कहीं दूर

आओ चले कहीं दूर
चले सपनों के गांव में

खेलें चलो हाथ पकड़कर
जरनोँ की मस्ती से
घूमें चलों साथ चलकर
पहाडों की बस्ती में
वादियों को हम चूमें
चलो साथ बागों में
आओ चले कहीं दूर
चले सपनो के गांव में

तू जो साथ चल दे मेरे
चल देंगी ये राहें
तू जो रहे पास मेरे
खिल उठेंगी बहारें
डाले हम डेरा तेरी
नजरों की छांव में
आओ चले कहीं दूर
चले सपनों के गांव में

Monday, May 28, 2007

आज रात मुजे तेरी बहुत याद आ रही है

अभी अभी मेरे वक्ष से कुछ निकला है।

मैं उफ भी न कर सका कि
वह मेरे सामने आकर बैठ गया।


दर्द का जिस्म से ईस तरह अलग हो जाना
हर एक रात की बात नहीं है.

कभी कभार तो मैंने ही बहुत कोशिशें की है
उसे बाहर निकाल खिंचने की
पर वह ईस तरह निकल आयेगा
कभी सोचा ही नहीं था.

आज रात मुजे तेरी बहुत याद आ रही है.
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अपनी माटी
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