सदियों की तलाश
पूरी हुई इस जनम में ...
तुझे ढूंढकर .
अब शुरू हो रही है
इंतजार की घडियां ...
पूर्ण होने में अभी देर है
जन्माजन्म का चक्र .
इंतज़ार के बाद
मिलन भी
सदियों तक .
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Saturday, December 29, 2007
Wednesday, November 14, 2007
आओ ! फिर से जियें हम
आओ ! फिर से जियें हम
आओ ! फिर से जियें हम,
एकदूसरे को एकदूसरे में समेटकर
खोज निकालें
नयी राह पर
नयी-सी मझिल।
झिल भरकर यादों की
बहती धारा बन जायें हम,
आऒ, एक नया शहर बसायें हम।
पंख लगाकर छूएं आसमां ...
निर्मल, निश्चल होकर
आऒ, डूबें
एकसाथ में
समंदर के गहरे तल में।
हाथ पसारें,
बांह डालें,
चलें डगर पर
एकदूजे का विश्वास लिये हम।
आऒ - फिर से जियें हम.
आओ ! फिर से जियें हम,
एकदूसरे को एकदूसरे में समेटकर
खोज निकालें
नयी राह पर
नयी-सी मझिल।
झिल भरकर यादों की
बहती धारा बन जायें हम,
आऒ, एक नया शहर बसायें हम।
पंख लगाकर छूएं आसमां ...
निर्मल, निश्चल होकर
आऒ, डूबें
एकसाथ में
समंदर के गहरे तल में।
हाथ पसारें,
बांह डालें,
चलें डगर पर
एकदूजे का विश्वास लिये हम।
आऒ - फिर से जियें हम.
Tuesday, October 16, 2007
तीन कविताएं
तीन कविताएं
(१)
मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में
तेरी तस्वीर बंद है .
तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूं
चोरी-चोरी, चूपके-चूपके ।
मेरे होठों पर कई दिनों से
तितली बैठने नहीं आयी ।
मेरी आंखों में कई दिनों से
एक कटी-पतंग उड रही है ।
मेरे कानों में निरव स्वर ने
झंकार देना छोड दिया है ।
मेरी अंगूलियों ने स्पर्श संवेदना
गंवा दी है ।
मैं एक बुत-सा बन गया हूं -
मुझे पारसमणि की तलाश है ।
तुम कब आओगी ?
(२)
तुम कब आओगी ?
रात के अंधेरों ने
मुझे बिस्तर पर तडपते हुए देखा है ।
कभी-कभार खुली आंखें
सपना देख रही होती है ।
बगल में रहे पेड के पत्तों की खडखडाहट
झांका करती है ,
मेरे बिस्तर पर , जो मेरे जिस्म से
भरा पडा होता है ।
चूपके-चूपके याद दस्तक दे जाती है
मेरे उद्विग्न मन के पट पर
और
उस रात मैं ज़िंदा जलाया जाता हूं
- उन यादों के हाथों , जो तेरे जाने के बाद आती है ।
मेरे कानों में तेरे अटहास की आवाज़
गुंज़ने लगती है .
उस दिन मेरा बिस्तर मुझे
मेरी आंखों के नीचे गिला हुआ मिलता है
फिर मैं अपने आपको पुछ बैठता हूं
तुम कब आओगी ?
(३)
तुम आओगी या नहीं ?
(१)
मेरी आंखों में उमडते हुए समंदर की हरएक बुंद में
तेरी तस्वीर बंद है .
तेरी हरएक तस्वीर को मैं झांका करता हूं
चोरी-चोरी, चूपके-चूपके ।
मेरे होठों पर कई दिनों से
तितली बैठने नहीं आयी ।
मेरी आंखों में कई दिनों से
एक कटी-पतंग उड रही है ।
मेरे कानों में निरव स्वर ने
झंकार देना छोड दिया है ।
मेरी अंगूलियों ने स्पर्श संवेदना
गंवा दी है ।
मैं एक बुत-सा बन गया हूं -
मुझे पारसमणि की तलाश है ।
तुम कब आओगी ?
(२)
तुम कब आओगी ?
रात के अंधेरों ने
मुझे बिस्तर पर तडपते हुए देखा है ।
कभी-कभार खुली आंखें
सपना देख रही होती है ।
बगल में रहे पेड के पत्तों की खडखडाहट
झांका करती है ,
मेरे बिस्तर पर , जो मेरे जिस्म से
भरा पडा होता है ।
चूपके-चूपके याद दस्तक दे जाती है
मेरे उद्विग्न मन के पट पर
और
उस रात मैं ज़िंदा जलाया जाता हूं
- उन यादों के हाथों , जो तेरे जाने के बाद आती है ।
मेरे कानों में तेरे अटहास की आवाज़
गुंज़ने लगती है .
उस दिन मेरा बिस्तर मुझे
मेरी आंखों के नीचे गिला हुआ मिलता है
फिर मैं अपने आपको पुछ बैठता हूं
तुम कब आओगी ?
(३)
तुम आओगी या नहीं ?
अध खुली आंखों मैं इंतज़ार ने
अभी-अभी टपकना शुरू किया है ।
टेबुल पर पडी किताब के पन्ने
छत पर लटके पंखे से उलटते रहते है ।
तुम आओगी या नहीं
यह मुझे नहीं पता
मगर
हररोज़ तुम्हारी याद सपनों में आकर
मुझे जागने को विवश कर देती है ।
कभी उत्तर मिलेगा या नहीं
कि
तुम आओगी या नहीं ?
Friday, August 17, 2007
मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये
मेरे ब्लोग के गुजराती मुलाकातियों के लिये मैं यहां मेरे मार्गदर्शक मित्र कविवर श्री सुरेन्द्र कडिया जी की कुछ रचनाएं प्रस्तुत कर रहा हूं ...
इन कविताओं पर आपका प्रतिभाव सादर निमंत्रित है...
श्री सुरेन्द्र कडिया जी से आप kadiya@sbs.co.in पर संपर्क कर सकते हैं ...
ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા
ફૂલોની ફરશ પર પસીનો ઠર્યો છે
કહે છે, હવાઓએ ઓચ્છવ કર્યો છે.
ફરી એની સામે અરીસો ધર્યો છે
ફરી એક તાજો સિતારો ખર્યો છે.
મુબારક હો સઘળું અખંડિત-અખંડિત
અમે શ્વાસનો સહેજ બખિયો ભર્યો છે.
હતો એક બુદ બુદ અહંથી છકેલો
કહે, આખેઆખો સમંદર તર્યો છે.
કદી બંધ કરશો તો અંધારું થાશે
કિતાબોની વચ્ચે સૂરજ તરવર્યો છે.
(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
**********************************************************
ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા
અઢળક ઊંડે તળિયે બેઠા
અમે અમારા ફળિયે બેઠા
વત્તો-ઓછો ભેદ મળે તો
જળમાંથી ઝળહળિયે બેઠા
શબદ-શબદની માયા બાંધી
કાગા થઈ કાગળિયે બેઠા
શબરી એંઠાં બોર ધરાવે
અનહદ-ફળના ઠળિયે બેઠા
નવલખ તારા ઠોલી થાક્યા
પછી તમારા નળિયે બેઠા
(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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(कवि श्री सुरेन्द्र कडिया जी की अनुमति से ब्लोग पर प्रकाशित)
इन कविताओं पर आपका प्रतिभाव सादर निमंत्रित है...
श्री सुरेन्द्र कडिया जी से आप kadiya@sbs.co.in पर संपर्क कर सकते हैं ...
ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા
ફૂલોની ફરશ પર પસીનો ઠર્યો છે
કહે છે, હવાઓએ ઓચ્છવ કર્યો છે.
ફરી એની સામે અરીસો ધર્યો છે
ફરી એક તાજો સિતારો ખર્યો છે.
મુબારક હો સઘળું અખંડિત-અખંડિત
અમે શ્વાસનો સહેજ બખિયો ભર્યો છે.
હતો એક બુદ બુદ અહંથી છકેલો
કહે, આખેઆખો સમંદર તર્યો છે.
કદી બંધ કરશો તો અંધારું થાશે
કિતાબોની વચ્ચે સૂરજ તરવર્યો છે.
(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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ગઝલ
- સુરેન્દ્ર કડિયા
અઢળક ઊંડે તળિયે બેઠા
અમે અમારા ફળિયે બેઠા
વત્તો-ઓછો ભેદ મળે તો
જળમાંથી ઝળહળિયે બેઠા
શબદ-શબદની માયા બાંધી
કાગા થઈ કાગળિયે બેઠા
શબરી એંઠાં બોર ધરાવે
અનહદ-ફળના ઠળિયે બેઠા
નવલખ તારા ઠોલી થાક્યા
પછી તમારા નળિયે બેઠા
(ગુજરાતી સામાયિક "નવનીત સમર્પણ"ના ઓગસ્ટ - ૨૦૦૭ના અંક્માં પ્રકાશિત રચના)
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(कवि श्री सुरेन्द्र कडिया जी की अनुमति से ब्लोग पर प्रकाशित)
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