Wednesday, January 16, 2008

मृत्यु

मृत्यु


मरघट पर
बरगद के पेड़ के नीचे
बैठा हुआ सन्नाटा
मुझे सदियों से कोसता रहा है ।

मैं अभी भी उठा नहीं हूँ
उसने मुझे आवाज दे -दे कर
कंठ में पहन ली है विषमाला ।

मैं नितांत अकेलापन चाहता हूँ
मैं अकेला रहना चाहता हूँ
मगर उसी बरगद पर
बैठा चमगादड
सन्नाटे को विषपान करते हुए देखकर
चिल्ला रहा है कब का ।

मुआ ! सोता भी नहीं
सोने देता भी नहीं,
जब कि
मुझे गाढी नींद आ रही है
सू - सू करते हुए सन्नाटे में ।

1 comment:

Dr Prabhat Tandon said...

एक अदद उधडी सी जिंदगी
टांकते-न-टांकते
आगे यों चल देने मे क्या तुक ?
रोना ही रोना
आपा खोना
रोना-कल्पना
अकारथ है
घुटे-२ जीना
केवल विष पीना
भटकना
अकारत है
सार्थकता
कुछ तो संजोये है -
चिरि-चुरमुन की
--चुक-चुक-चिक
चुक-चुक
आगे यों चल देने मे क्या तुक ?

घेरे मे जीवन
आंखॊं पर पट्टियां
-यातना
निरंतरता
लीक-लीक गाडी
चाबुक -दर-चाबुक
-भागना
निरंतरता
मशीनी करिशमे-
कट-पिट-चिट-पट
कुछ रुक
आगे चल देने मे क्या तुक?
एक अदद उधडी सी जिंदगी
डांकते -न-टांकते
आगे चल देने मे क्या तुक ?

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अपनी माटी
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