Wednesday, December 05, 2007

एक घंटे की मुलाकात

एक घंटे की मुलाकात

इतनी बोझिल होगी

यह आज ही पाया.


तुम चले गये ...

हम पर्वतों पर चढे थे,

मैं कहां समंदर के किनारे आ पहुंचा ?


हमने छू ली थी ऊंचाई चट्टानों की,

मैं कहां घिर गया हवा के झोंकों में ?

हवा के हरेक झोंके के स्पर्श से

एक तीर निकल जाता है आरपार .


हरबार लबों पर आ जाता है,

तुम्हारा नाम .


हर पल एक-एक साल की तरह बीतता है

जब रात को तेरी यादों का झोंका

छू लेता है मुझे .


बुदबुदों की तरह हर लम्हा

एक घाव दे कर जाता है,

तुम्हारे साथ गुजारी हुई हर पल

आंखों के सामने से गुजरती है .


मैं
तुम्हें आवाज देता हूं

मगर

मेरी आवाज कहां ? . . .

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अपनी माटी
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